Who Started Pandharpur Wari? संत ज्ञानेश्वर से तुकाराम तक: वारी परंपरा का संपूर्ण इतिहास 2026

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पंढरपुर वारी की शुरुआत किसने की? जानिए 800 वर्ष पुराना इतिहास, परंपरा और पालखी सोहला

Who Started Pandharpur Wari महाराष्ट्र की पावन भूमि संतों और महापुरुषों की भूमि रही है। यहाँ भक्ति, समरसता और ईश्वर-प्रेम का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जो दुनिया में कहीं और दुर्लभ है। इस भक्ति आंदोलन की सबसे बड़ी और जीवंत पहचान है — पंढरपुर वारी (Pandharpur Wari)

हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी (आषाढ़ी एकादशी) पर लाखों वारकरी (विट्ठल भक्त) पैदल चलकर पंढरपुर में भगवान श्री विट्ठल (विठोबा) और माता रुक्मिणी के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पंढरपुर वारी की शुरुआत किसने की थी? इस दिव्य यात्रा का इतिहास क्या है और यह समय के साथ कैसे बदलती गई?

आइए, इस विस्तृत लेख में पंढरपुर वारी के 800 से अधिक वर्षों पुराने स्वर्णिम इतिहास, इसके संस्थापकों, संत परंपरा और पालखी सोहला के उद्भव को गहराई से समझते हैं।

पंढरपुर वारी की शुरुआत किसने की? (मुख्य बिंदु)

Who Started Pandharpur Wari पंढरपुर वारी किसी एक व्यक्ति द्वारा एक दिन में शुरू की गई यात्रा नहीं है। यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विकास का परिणाम है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से वारी की शुरुआत को तीन प्रमुख चरणों में विभाजित किया जाता है:

  1. प्रथम चरण (पौराणिक शुरुआत): संत पुंडलिक (Sant Pundalik) — जिन्होंने भगवान विट्ठल को पंढरपुर में ईंट पर विराजमान किया।
  2. द्वितीय चरण (भक्ति आंदोलन और वारी की नींव): संत ज्ञानेश्वर महाराज (13वीं सदी) और संत नामदेव महाराज — जिन्होंने सामूहिक पैदल वारी परंपरा को संगठित रूप दिया।
  3. तृतीय चरण (आधुनिक पालखी सोहला): हैबतरावबाबा आरफालकर (19वीं सदी) — जिन्होंने संत ज्ञानेश्वर महाराज की पादुकाओं को रथ में रखकर व्यवस्थित ‘पालखी सोहला’ (Palkhi Procession) की शुरुआत की।

1. संत पुंडलिक: पंढरपुर और विट्ठल भक्ति के आद्य जनक

Who Started Pandharpur Wari पौराणिक कथाओं के अनुसार, पंढरपुर में भगवान विट्ठल का आगमन संत पुंडलिक की माता-पिता भक्ति के कारण हुआ था। संत पुंडलिक जब अपने माता-पिता की सेवा कर रहे थे, तब स्वयं भगवान श्रीकृष्ण (विष्णु) उनके दर्शन के लिए पधारे।

संत पुंडलिक ने माता-पिता की सेवा में बाधा न डालते हुए भगवान के खड़े होने के लिए एक ईंट (मराठी में ‘वीट’) आगे खिसका दी। भगवान उसी ईंट पर दोनों हाथ कमर पर रखकर खड़े हो गए और ‘विट्ठल’ (ईंट पर खड़े रहने वाले) कहलाए।

संत पुंडलिक ने ही भगवान से पंढरपुर में सदैव विराजमान रहने का वरदान माँगा और यहीं से पंढरपुर की तीर्थ यात्रा की आधारशिला रखी गई।

2. संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव: वारी परंपरा के वास्तविक संस्थापक

Who Started Pandharpur Wari ऐतिहासिक और प्रमाणिक साक्ष्यों के अनुसार, पंढरपुर की पैदल यात्रा (वारी) की नियमित शुरुआत 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर महाराज (Sant Dnyaneshwar) और संत नामदेव महाराज (Sant Namdev) के काल में हुई।

  • संत ज्ञानेश्वर के पिता की परंपरा: संत ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठलपंत भी नियमित रूप से आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर पैदल जाते थे।
  • सामूहिक यात्रा का रूप: संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव ने भक्ति आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए महाराष्ट्र के कोने-कोने से श्रद्धालुओं को एकत्र कर पंढरपुर पैदल जाने का आह्वान किया।
  • जाति-पात से परे भक्ति: इस वारी ने ऊँच-नीच, वर्ग और जाति के भेदभाव को मिटाकर ‘वारकरी संप्रदाय’ की स्थापना की। संत एकनाथ महाराज और संत तुकाराम महाराज ने भी 16वीं और 17वीं सदी में इस परंपरा को और अधिक समृद्ध किया।

3. हैबतरावबाबा आरफालकर: आधुनिक पालखी सोहला के जन्मदाता

Who Started Pandharpur Wari आज हम जो अनुशासित और भव्य पालखी सोहला (Palkhi Sohala) देखते हैं, उसका श्रेय हैबतरावबाबा आरफालकर (Haibatravbaba Arphalkar) को जाता है।

1800 के दशक की शुरुआत (19वीं सदी) में सिंधिया राजवंश के सरदार और संत ज्ञानेश्वर महाराज के अनन्य भक्त हैबतरावबाबा आरफालकर ने वारी के आयोजन को एक व्यवस्थित रूप दिया:

  • उन्होंने संत ज्ञानेश्वर महाराज की पादुका (Footprints) को एक अलंकृत चांदी के रथ (पालखी) में स्थापित किया।
  • उन्होंने वारी के दौरान चलने वाले ‘दिंडी’ (भक्तों के समूह), ठहराव के स्थान (तंबू), भोजन व्यवस्था, ताल-मृदंग वादक और सुरक्षा व्यवस्था के कड़े नियम बनाए।
  • इसके साथ ही संत तुकाराम महाराज के छोटे पुत्र तपोनिधि नारायण महाराज ने भी देहू से संत तुकाराम महाराज की पालखी निकालने की शुरुआत की।

महाराष्ट्र पर्यटन विभाग (MTDC Official Portal): maharashtratourism.gov.in

श्री विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर संस्थान पंढरपुर: vitthalrukminimandir.org

पंढरपुर वारी का ऐतिहासिक कालक्रम (Historical Timeline)

Who Started Pandharpur Wari पौराणिक काल: संत पुंडलिक

12वीं सदी या पूर्व

संत पुंडलिक की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विट्ठल पंढरपुर में ईंट पर विराजे।

वारकरी संप्रदाय का उदय: संत ज्ञानेश्वर व संत नामदेव

1290 – 1300 ई.

संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव ने पंढरपुर की सामूहिक पैदल वारी यात्रा को व्यापक जन-आंदोलन बनाया।

भक्ति आंदोलन का प्रसार: संत तुकाराम

17वीं शताब्दी

Who Started Pandharpur Wari संत तुकाराम महाराज ने अभंगों के माध्यम से वारकरी विचार का प्रचार-प्रसार किया और वारी को जन-आस्था का केंद्र बनाया।

आधुनिक पालखी प्रथा: हैबतरावबाबा आरफालकर

1832 ई.

आलंदी से पंढरपुर तक संत ज्ञानेश्वर महाराज की पादुकाओं की व्यवस्थित रथ-पालखी यात्रा का शुभारंभ हुआ।

मुख्य पालखी मार्ग और उनके केंद्र

Who Started Pandharpur Wari पंढरपुर वारी में महाराष्ट्र के अलग-अलग संतों के जन्म/समाधि स्थलों से पालखियाँ निकलती हैं, जो आषाढ़ी एकादशी के दिन पंढरपुर में एकत्र होती हैं:

संत महाराजपालखी का प्रस्थान स्थलदूरी (लगभग)यात्रा की अवधि
संत ज्ञानेश्वर महाराजआलंदी (पुणे)~250 किमी21 दिन
संत तुकाराम महाराजदेहू (पुणे)~250 किमी18 दिन
संत सोपानदेवसासवड~210 किमी15 दिन
संत मुक्ताबाईमुक्ताईनगर (जलगाँव)~450 किमी30 दिन
संत गजानन महाराजशेगाँव~550 किमी33 दिन

पंढरपुर वारी की प्रमुख विशेषताएँ और नियम

  1. वारकरी वेशभूषा: पुरुष वारकरी सफेद धोती-कुर्ता, तुलसी की माला और सिर पर गांधी टोपी या साफा पहनते हैं। महिलाएँ नौवारी या साधारण साड़ी पहनकर सिर पर तुलसी का पौधा (तुलसी वृंदावन) या पानी का कलश लेकर चलती हैं।
  2. दिंडी व्यवस्था: पूरी वारी अनुशासित समूहों में बँटी होती है जिन्हें ‘दिंडी’ कहा जाता है। प्रत्येक दिंडी का अपना नंबर और प्रमुख होता है।
  3. रिंगण सोहला (Ringan): वारी के रास्ते में ‘रिंगण’ का आयोजन होता है, जहाँ पवित्र घोड़ा (माऊलींचा अश्व) दौड़ता है। भक्त इस मैदान में गोलाकार घेरा बनाकर ‘ज्ञानबा-तुकाराम’ के जयघोष के साथ घूमते हैं।
  4. अन्नदान व सेवा: वारी मार्ग में पड़ने वाले गाँवों के लोग वारकरियों के रहने, खाने और चिकित्सा की नि:शुल्क व्यवस्था करते हैं।
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वारकरी संप्रदाय महाराष्ट्र की एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और समतावादी भक्ति परंपरा है, जो भगवान श्री विट्ठल (विठोबा) को अपना आराध्य मानती है। यह संप्रदाय कर्म, भक्ति और सामाजिक समानता का अद्भुत संतुलन सिखाता है।

आइए वारकरी संप्रदाय के मुख्य नियमों, उनकी सात्विक भोजन शैली और उनके जीवन दर्शन को विस्तार से समझते हैं:

वारकरी संप्रदाय का मूल मंत्र: “हाती काम, मुखी नाम” (हाथों से अपना कर्तव्य व कार्य करें और मुख से निरंतर ईश्वर का नाम जपें।)

1. मुख्य नियम (Core Rules)

Who Started Pandharpur Wari वारकरी बनने के लिए किसी कठोर संन्यास या अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि नैतिक और आचार-संहिता से जुड़े कुछ मुख्य नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है:

  • तुलसी माला धारण करना: गले में तुलसी की माला पहनना एक वारकरी की सबसे मुख्य पहचान है। माला धारण करने का अर्थ है कि व्यक्ति ने सात्विक और भक्तिमय जीवन जीने का संकल्प लिया है।
  • नियमित वारी (यात्रा): वर्ष में कम से कम दो बार (विशेषकर आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर) पंढरपुर की यात्रा/वारी करना या दर्शन का नियम निभाना।
  • एकादशी व्रत: प्रत्येक माह की दोनों एकादशी (शुक्ल और कृष्ण पक्ष) का निष्ठापूर्वक उपवास रखना।
  • व्यसन मुक्ति: शराब, तंबाकू, सिगरेट या किसी भी प्रकार के नशे से पूरी तरह दूर रहना।
  • नैतिक आचरण: सत्य बोलना, चोरी न करना, हिंसा न करना और पराए स्त्री/पुरुष को माता या भाई-बहन के समान आदर देना।
  • नित्य ग्रंथ वाचन: प्रतिदिन ‘हरिपाठ’ (संत ज्ञानेश्वर कृत) का पाठ करना और संत तुकाराम महाराज के अभंग, ज्ञानेश्वरी व एकनाथी भागवत का अध्ययन करना।

2. भोजन शैली (Dietary Lifestyle)

Who Started Pandharpur Wari वारकरी संप्रदाय में भोजन को केवल शरीर चलाने का साधन नहीं, बल्कि प्रसाद और साधना का अंग माना गया है:

  • Who Started Pandharpur Wari पूर्णतः शाकाहारी (Strict Vegetarianism): वारकरी संप्रदाय में मांस, मछली, अंडे या किसी भी जीव हिंसा से बना भोजन पूरी तरह वर्जित है।
  • सात्विक और सरल आहार: ताज़ा, सुपाच्य और सात्विक भोजन (दाल, भात, रोटी, हरी सब्जियाँ) खाया जाता है। अत्यधिक मिर्च-मसाले और तामसिक भोजन से बचा जाता है।
  • एकादशी उपवास का भोजन: एकादशी के दिन साबूदाना, मोरधन (भगार/समा के चावल), फल, मूँगफली, दूध और उबले आलू/रतालू जैसा हल्का फलाहार लिया जाता है।
  • अन्नदान की परंपरा: वारी के दौरान या सामान्य जीवन में भी वारकरी अपने भोजन में से दूसरों (विशेषकर भूखे और अतिथियों) को बाँटकर खाने पर विश्वास रखते हैं।

3. जीवन दर्शन (Philosophy of Life)

Who Started Pandharpur Wari वारकरी संप्रदाय का दर्शन अत्यंत व्यावहारिक, प्रगतिशील और जन-सामान्य के लिए सुलभ है:

(क) सर्वभूती भगवद्भाव (हर जीव में ईश्वर का दर्शन)

वारकरी दर्शन का सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि भगवान विट्ठल केवल मंदिर में नहीं, बल्कि संसार के हर मनुष्य, पशु-पक्षी और प्रकृति में बसे हैं। इसलिए किसी से द्वेष या भेदभाव न करना ही सच्ची भक्ति है।

(ख) गृहस्थाश्रम में भक्ति (कोई संन्यास नहीं)

Who Started Pandharpur Wari वारकरी परंपरा में घर-परिवार त्यागने या जंगलों में जाने की सलाह नहीं दी जाती। संतों ने सिखाया कि किसान खेत में काम करते हुए, व्यापारी व्यापार करते हुए और गृहस्थ अपने परिवार की सेवा करते हुए भी सर्वोच्च भक्ति प्राप्त कर सकता है।

(ग) सामाजिक समानता और समरसता

Who Started Pandharpur Wari 13वीं शताब्दी में ही वारकरी संप्रदाय ने जात-पात, ऊँच-नीच और लिंग-भेद को पूरी तरह नकार दिया था। संत चोखामेला, संत कान्होपात्रा, संत जनाबाई, संत गोरा कुम्हार और संत नरहरी सोनार जैसे अलग-अलग पृष्ठभूमि के संतों ने मिलकर एक ही मंच पर विट्ठल भक्ति का संदेश दिया।

(घ) नामस्मरण की महिमा

Who Started Pandharpur Wari कठिन कर्मकांड, यज्ञ या तंत्र-मंत्र की जगह केवल “राम कृष्ण हरि” या “ज्ञानबा-तुकाराम” नाम का सहज जाप ही मोक्ष और मानसिक शांति का मार्ग माना गया है।

5. Safety & Disclaimer (सुरक्षा और अस्वीकरण)

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख ऐतिहासिक संदर्भों, वारकरी संप्रदाय के पारंपरिक साहित्य और प्रामाणिक सांस्कृतिक ग्रंथों के आधार पर जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है। धार्मिक और ऐतिहासिक तथ्यों के कालक्रम में विभिन्न स्रोतों के अनुसार आंशिक भिन्नता हो सकती है। यात्रा के समय और मार्गों की अद्यतन जानकारी के लिए आधिकारिक मंदिर समिति या स्थानीय प्रशासन की गाइडलाइंस का पालन करें।

6. Call to Action (CTA)

Who Started Pandharpur Wari क्या आप भी इस वर्ष पंढरपुर वारी या आषाढ़ी एकादशी दर्शन का हिस्सा बनने की योजना बना रहे हैं? यदि आपके पास पंढरपुर वारी या वारकरी संप्रदाय से जुड़ा कोई अनुभव या प्रश्न है, तो नीचे कमेंट (Comment) करके हमें ज़रूर बताएं। इस लेख को अपने मित्रों और परिवार के साथ शेयर (Share) करें ताकि संत परंपरा का यह पावन इतिहास सभी तक पहुँच सके!

7. Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1. पंढरपुर वारी की शुरुआत सबसे पहले किसने की थी?

Who Started Pandharpur Wari उत्तर: पंढरपुर वारी की शुरुआत का श्रेय संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत नामदेव महाराज को जाता है (13वीं सदी)। पौराणिक मान्यताओं में संत पुंडलिक को भगवान विट्ठल को पंढरपुर लाने का श्रेय दिया जाता है।

Q3. वारकरी (Varkari) का क्या अर्थ है?

Who Started Pandharpur Wari उत्तर: ‘वारी’ का अर्थ है नियम से बार-बार यात्रा करना, और जो व्यक्ति प्रतिवर्ष आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर की पैदल यात्रा करता है, उसे वारकरी कहा जाता है।

Q5. आलंदी से पंढरपुर की दूरी कितनी है?

Who Started Pandharpur Wari उत्तर: आलंदी से पंढरपुर की पैदल दूरी लगभग 250 किलोमीटर है, जिसे पालखी सोहला लगभग 21 दिनों में पूरा करता है।

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